अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के मार्गदर्शनकर्ता

वर्ष 1947 में हजारों वर्षों की गुलामी के पश्चात 15 अगस्त को हमें खंडित आजादी मिली। स्वाधीन होने के पश्चात भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती युवाओं की ऊर्जा का नियोजन और भारत की आगामी दिशा तय करना था। स्वाधीनता के एक वर्ष बाद यानी 1948 में अतीत से सीख लेकर स्वर्णिम भारत की संकल्पना को केन्द्र में रखकर युवाओं के ऊर्जा का नियोजन कर उसे उचित दिशा देने के उद्देश्य अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का जन्म हुआ, जिसका विधिवत पंजीयन नौ जुलाई 1949 को हुआ। 1948-49 में परिषद के रूप में जो बीज बोया गया था वह आज विशाल वट वृक्ष का आकार लेकर दुनिया के सबसे बड़े छात्र संगठन के रूप में स्थापित हो चुका है। वर्ष 1948 राष्ट्रीय पुनर्निमाण का ध्येय लेकर परिषद की यात्रा आंरभ हुई लेकिन इसका अखिल भारतीय स्तर पर धाक तक बनी जब प्रा. यशवंतराव केलकर रूप में परिषद को शिल्पकार मिला।

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यूं तो विद्यार्थी परिषद को खड़ा करने में अनेकानेक कार्यकर्ताओं का योगदान है लेकिन प्रा. यशवंत राव केलकर का योगदान उल्लेखनीय है। परिषद को अखिल भारतीय स्तर ले जाने की रूपरेखा उन्होंने ही तैयार की। अपने अकथ परिश्रम से उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में एक ऐसी कार्यशैली विकसित की जिसका अनुसरण करते हुए आज सात दशक बाद भी विद्यार्थी परिषद का कार्य निरंतर प्रगति के पथ पर है। उनके साथ कार्य करने वाले परिषद के वरिष्ठ कार्यकर्ता कहते हैं कि केलकर जी से जो एक बार मिल लिये सदा के लिए उनका ही हो गये।  कार्यकर्ताओं के व्यक्तित्व का सही दिशा में विकास हो, इस दृष्टि से उन्होंने उनकी संभाल और देखभाल की। हर कार्यकर्ता को काम और हर कार्य के लिए कार्यकर्ता की संकल्पना परिषद कार्यपद्धति का आधार है। कार्यकर्ता संभाल की यशवंतराव जी की विशिष्ट पद्धति थी । कार्यकर्ता को एक मनुष्य के नाते समझना, परखना और उसकी क्षमताओं तथा गुणों का विकास करते हुए उसे प्रेरणाओं से भर देना, यह उनकी कार्यकर्ता निर्माण और कार्यकर्ता संभाल की आधारशिला थी I स्वर्गीय यशवंत राव केलकर जी की आज जन्म तिथि है। थे। आज ही के दिन 25 अप्रैल 1925 में महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में पंढरपुर नामक कटवे तीर्थक्षेत्र में उनका जन्म हुआ था। प्रा. केलकर ने कहा था कि हम सब अपूर्णांक हैं और मिलकर पूर्णांक बनते हैं, इस बात पर विश्वास रखना हमारी विशेषता है। हम यह भी मानते हैं कि सभी अपूर्णांक समान महत्व के होते हैं। अधिक महत्वपूर्ण अपूर्णांक और कम महत्वपूर्ण अपूर्णांक ऐसा नहीं होता है।

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